कविताएँ
ऍसा मेरा गाँव
ggggggggggg
बिना लकुटिया चले बुढ़ापा
ले नाती के पाँव
ऍसा मेरा गाँव.....।
सावन –भादों आल्हा बँचती
क्वाँर खेत में हल
सबसे मोह छोह के नाते
जीवन है निश्छल
काका, ताऊ, भैया, भावज
सुख की शीतल छाँव
ऍसा मेरा गाँव.....।
बुने हुए स्वेटर–मफलर से
प्रीति – पगे व्यवहार
त्योहारों पर दरस परस ज्यों
कसे स्वर्ण के तार
आशीषों के ढेर वृद्धजन
कहीं न ठाँव कुठाँव
ऍसा मेरा गाँव.....।
पशु–पक्षी खलिहान खेत से
है अपना नाता
सरिता तट पर जुड़ते मेले
दंगल मन भाता
अँधियारी रातों में रसिया
मौज हौंस का भाव
ऍसा मेरा गाँव.....।
परी कथाएँ सुनें रात को
दिन में रामायन
दादी को बच्चे ना छोड़ें
जैसे जीवन–धन
संध्या–बेला, तुलसी चौरा
हैं बहुओं के नाँव
ऍसा मेरा गाँव.....।
***
ggggggggggggggg

2 Comments:
Dr.Indira ji ! Kavitayin dekh raha hon. ganu ki kavita mein to aapne bharat ke gaoun ko puri tarah se chitrit kar diya hai. bahut bahut badhayi aapko. kya aap haiku kavita bhi lakhati hain?
Sushmita chaudhari, singapur
प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यबाद। मै हिन्दी की कई विधाओं में लिखती हूँ। हाइकु कविता भी लिखती हूँ। मेरी हाइकु कविताएँ आप जल्दी ही जालघर पर पढ़ सकेंगे।
डॉ॰ इन्दिरा अग्रवाल
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