मशाल
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प्यार तुम्हारा
एक अहसास
स्निग्ध, सौम्य
सुन्दर और गम्भीर
बाद तुम्हारे
अक्षय कोष
स्मृति, अनुभूतियों का
चीरेगा तिमिर
गहन विपदाओं का
दिखायेगा राह
बनेगा मशाल।
***
धूप
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तेरी सादगी ने
मुझको तो
बाँध लिया ऍसे
जैसे बाँधे अंतरिक्ष
नक्षत्र अनेक
अंक बाँधे जैसी
शून्य अनेक
लाखों में तेरे
प्यार का यह रूप
दे गया मुझको तो
जीवन की धूप ।
***
विचारणीय प्रश्न
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समय का
थर्मामीटर
जनसंख्या का
बढ़ता पारा
प्रदूषण का
अनियंत्रित ताप
करेगा विनाश
सम्पूर्ण मानवता का
किसी एक मजहब
जाति, क्षेत्र, देश
अथवा राष्ट्र का नहीं
समस्त वैभवमयी
सृष्टि का
फिर भी बने हैं, सब
अनभिज्ञ
क्यों ............यहाँ ?
होगी, कभी, परिवर्तित
संकुचित, मानसिकता
इनकी, किंवा
होगा विलीन असितत्व
समय के गर्भ में
इस धरती का
सोचनीय
विचारणीय
चिंतनीय
प्रश्न बना
रचनाकार का ?
***
झाँक रही धूप
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खड़ी खड़ी खिड़की से
बच्ची सी
झाँक रही धूप ।।
निरख रही मुखड़े को
झीलों के दर्पण में
मानो कहती हो यह
जीवन है यौवन में
उम्र की चदरिया पर
मुसकानें
टाँक रही धूप ।
खड़ी-खड़ी खिड़की से
बच्ची सी
झाँक रही धूप ।।
आँचल को लहराकर
छितराती हँसी खुशी
कितनों के घरों में
चुपके से जा घुसी
रंगों की गंधों की
चितवन को
आँक रही धूप ।
खड़ी खड़ी खिड़की से
बच्ची-सी
झाँक रही धूप ।।
फुनगी पर चढ़ चढ़ कर
बात करे मौसम की
गुमसुम क्यों बैठे हो
जगती है दम ख़म की।
बैल जोत कर हल में
खेतों में
हाँक रही धूप ।
खड़ी-खड़ी खिड़की से
बच्ची-सी
झाँक रही धूप ।।
पर्वत के शिखरों से
करती छेड़खानियाँ
गुम्बदों मीनारों को
सुनाती कहानियाँ
रजनी के काजल को
भर मुट्ठी
फाँक रही धूप ।
खड़ी-खड़ी खिड़की से
बच्ची-सी
झाँक रही धूप ।।
***
मेरा देश
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यह है मेरा देश सुहाना
यह है मेरा देश
जहाँ सूर्य प्रातः प्राची से
दे जीवन संदेश
यह है मेरा देश ।
ऍसा मेरा देश ।।
मुझे सदा प्राणों से प्यारा
ये मेरी आँखों का तारा
गंगा यमुना-सी सरिताएँ
और हिमालय जग से न्यारा
मेरी मातृभूमि पर मोहित
मुनिवर और महेश
यह है मेरा देश ।
ऍसा मेरा देश ।।
खूबी अजब मेरे गुलशन की
धरती गौतम और किशन की
त्याग और बलिदान दिलाते
यादें अपने राम लखन की
रघुकुल के प्रताप से शोभित
यह शीतल चन्द्रेश
यह है मेरा देश ।
ऍसा मेरा देश ।।
प्रातः बनारस, साँय अवध ने
इसका रूप निखारा
चरण पखार छन्द हो जाती
सागर की जल धारा
मिल कर गुण जननी के गाते
निर्धन और नरेश
यह है मेरा देश ।
ऍसा मेरा देश ।।
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बिन्दास उजाले
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ये कैसे बिन्दास उजाले ?
किरणों के संग रास रचायें
दिखने में हैं भोले भाले
ये कैसे बिन्दास उजाले ?
जहाँ-जहाँ पर इन्हें दीखतीं
सोने की रेखायें
पूरी शक्ति लगा कर दौड़े
तोड़ सभी सीमायें
वेष दे रहा सबको धोखा
तकते खिड़की और झरोखा
कटती रात बोतलों के संग
इन्द्रधनुष जैसे मन वाले ।
ये कैसे बिन्दास उजाले ?
जो भी जहाँ सुमन खिलता है
मौसम या बे मौसम
मिल ही जाती इन्हें सूचना
किसमें कितना है दम ?
रूप रंग कुछ भी तय कर लें
घर में सुख सुविधाएँ भर लें
पैसे से कुछ भी न असम्भव
कितने मुख काले कर डालें ।
ये कैसे बिन्दास उजाले ?
दान धर्म थोड़ा-सा करके
कालिख धो लेते हैं
तीर्थाटन देशाटन करके
उज्ज्वल हो लेते हैं
पण्डित को घर बुलवा लेते
पावन मंत्रोच्चार कराते
सारे पुण्य इन्हीं के खाते
धर्म–ध्वजा के ये रखवाले ।
ये कैसे बिन्दास उजाले ?
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-डॉ॰ इन्दिरा अग्रवाल
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