11.6.05

परिचय

Dr.imdira
2जुलाई 1950 को अलीगढ़, उत्तर-प्रदेश में जन्मी डॉ॰ इन्दिरा अग्रवाल हिन्दी साहित्य में एम॰ए॰, पी-एच॰डी, विद्या वाचस्पति तथा संगीत प्रभाकर की उपाधियाँ ले चुकी हैं। साहित्य की अनेक विधाओं में आप निरन्तर लेखन कर रही हैं। आपकी रचनाएँ आकाशवाणी से प्रसारित होती रहती हैं तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन हो रहा है। अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित डॉ॰इन्दिरा अग्रवाल कई पत्रिकाओं के सम्पादन में भी अपना सहयोग दे रहीं हैं।
आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं-
* संचित संवेग (कविता-संग्रह) जनवरी- 2001
* उद्वेलित आवेग (कविता संग्रह) नवम्बर- 2002
* उन्मुक्त स्वर (कविता संग्रह( अगस्त-2004
* कालांश (हाइकु संग्रह) अक्टूवर-2004
सम्प्रति- आप प्रवक्ता (हिन्दी) पद पर कार्यरत है।
सम्पर्क सूत्र-
'आकर्षण'
गली नं॰ - 4
(स्टेडियम के पीछे)
रामबाग कॉलौनी
रामघाट रोड
अलीगढ़ (उ॰प्र॰) 202001
दूरभाष-0571-2741785
मोबाइल- 9412176767

7.6.05

कविताएँ

ऍसा मेरा गाँव
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बिना लकुटिया चले बुढ़ापा
ले नाती के पाँव
ऍसा मेरा गाँव.....।

सावन –भादों आल्हा बँचती
क्वाँर खेत में हल
सबसे मोह छोह के नाते
जीवन है निश्छल
काका, ताऊ, भैया, भावज
सुख की शीतल छाँव
ऍसा मेरा गाँव.....।


बुने हुए स्वेटर–मफलर से
प्रीति – पगे व्यवहार
त्योहारों पर दरस परस ज्यों
कसे स्वर्ण के तार
आशीषों के ढेर वृद्धजन
कहीं न ठाँव कुठाँव
ऍसा मेरा गाँव.....।


पशु–पक्षी खलिहान खेत से
है अपना नाता
सरिता तट पर जुड़ते मेले
दंगल मन भाता
अँधियारी रातों में रसिया
मौज हौंस का भाव
ऍसा मेरा गाँव.....।


परी कथाएँ सुनें रात को
दिन में रामायन
दादी को बच्चे ना छोड़ें
जैसे जीवन–धन
संध्या–बेला, तुलसी चौरा
हैं बहुओं के नाँव
ऍसा मेरा गाँव.....।
***


-डॉ॰ इन्दिरा अग्रवाल
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कविताएँ [2]

मशाल
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प्यार तुम्हारा
एक अहसास
स्निग्ध, सौम्य
सुन्दर और गम्भीर
बाद तुम्हारे
अक्षय कोष
स्मृति, अनुभूतियों का
चीरेगा तिमिर
गहन विपदाओं का
दिखायेगा राह
बनेगा मशाल।
***


धूप
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तेरी सादगी ने
मुझको तो
बाँध लिया ऍसे
जैसे बाँधे अंतरिक्ष
नक्षत्र अनेक
अंक बाँधे जैसी
शून्य अनेक
लाखों में तेरे
प्यार का यह रूप
दे गया मुझको तो
जीवन की धूप ।
***


विचारणीय प्रश्न
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समय का
थर्मामीटर
जनसंख्या का
बढ़ता पारा
प्रदूषण का
अनियंत्रित ताप
करेगा विनाश
सम्पूर्ण मानवता का
किसी एक मजहब
जाति, क्षेत्र, देश
अथवा राष्ट्र का नहीं
समस्त वैभवमयी
सृष्टि का
फिर भी बने हैं, सब
अनभिज्ञ
क्यों ............यहाँ ?
होगी, कभी, परिवर्तित
संकुचित, मानसिकता
इनकी, किंवा
होगा विलीन असितत्व
समय के गर्भ में
इस धरती का
सोचनीय
विचारणीय
चिंतनीय
प्रश्न बना
रचनाकार का ?
***


झाँक रही धूप
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खड़ी खड़ी खिड़की से
बच्ची सी
झाँक रही धूप ।।

निरख रही मुखड़े को
झीलों के दर्पण में
मानो कहती हो यह
जीवन है यौवन में
उम्र की चदरिया पर
मुसकानें
टाँक रही धूप ।
खड़ी-खड़ी खिड़की से
बच्ची सी
झाँक रही धूप ।।

आँचल को लहराकर
छितराती हँसी खुशी
कितनों के घरों में
चुपके से जा घुसी
रंगों की गंधों की
चितवन को
आँक रही धूप ।
खड़ी खड़ी खिड़की से
बच्ची-सी
झाँक रही धूप ।।

फुनगी पर चढ़ चढ़ कर
बात करे मौसम की
गुमसुम क्यों बैठे हो
जगती है दम ख़म की।
बैल जोत कर हल में
खेतों में
हाँक रही धूप ।
खड़ी-खड़ी खिड़की से
बच्ची-सी
झाँक रही धूप ।।

पर्वत के शिखरों से
करती छेड़खानियाँ
गुम्बदों मीनारों को
सुनाती कहानियाँ
रजनी के काजल को
भर मुट्ठी
फाँक रही धूप ।
खड़ी-खड़ी खिड़की से
बच्ची-सी
झाँक रही धूप ।।
***


मेरा देश
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यह है मेरा देश सुहाना
यह है मेरा देश
जहाँ सूर्य प्रातः प्राची से
दे जीवन संदेश
यह है मेरा देश ।
ऍसा मेरा देश ।।

मुझे सदा प्राणों से प्यारा
ये मेरी आँखों का तारा
गंगा यमुना-सी सरिताएँ
और हिमालय जग से न्यारा
मेरी मातृभूमि पर मोहित
मुनिवर और महेश
यह है मेरा देश ।
ऍसा मेरा देश ।।

खूबी अजब मेरे गुलशन की
धरती गौतम और किशन की
त्याग और बलिदान दिलाते
यादें अपने राम लखन की
रघुकुल के प्रताप से शोभित
यह शीतल चन्द्रेश
यह है मेरा देश ।
ऍसा मेरा देश ।।

प्रातः बनारस, साँय अवध ने
इसका रूप निखारा
चरण पखार छन्द हो जाती
सागर की जल धारा
मिल कर गुण जननी के गाते
निर्धन और नरेश
यह है मेरा देश ।
ऍसा मेरा देश ।।
***


बिन्दास उजाले
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ये कैसे बिन्दास उजाले ?
किरणों के संग रास रचायें
दिखने में हैं भोले भाले
ये कैसे बिन्दास उजाले ?

जहाँ-जहाँ पर इन्हें दीखतीं
सोने की रेखायें
पूरी शक्ति लगा कर दौड़े
तोड़ सभी सीमायें
वेष दे रहा सबको धोखा
तकते खिड़की और झरोखा
कटती रात बोतलों के संग
इन्द्रधनुष जैसे मन वाले ।
ये कैसे बिन्दास उजाले ?

जो भी जहाँ सुमन खिलता है
मौसम या बे मौसम
मिल ही जाती इन्हें सूचना
किसमें कितना है दम ?
रूप रंग कुछ भी तय कर लें
घर में सुख सुविधाएँ भर लें
पैसे से कुछ भी न असम्भव
कितने मुख काले कर डालें ।
ये कैसे बिन्दास उजाले ?

दान धर्म थोड़ा-सा करके
कालिख धो लेते हैं
तीर्थाटन देशाटन करके
उज्ज्वल हो लेते हैं
पण्डित को घर बुलवा लेते
पावन मंत्रोच्चार कराते
सारे पुण्य इन्हीं के खाते
धर्म–ध्वजा के ये रखवाले ।
ये कैसे बिन्दास उजाले ?
***



-डॉ॰ इन्दिरा अग्रवाल
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